उज्जैन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम” के मंच से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शहर की ऐतिहासिक और वैज्ञानिक विरासत को नए नजरिए से सामने रखा। उन्होंने कहा कि उज्जैन केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सदियों से विज्ञान, गणित और खगोल ज्ञान का भी प्रमुख केंद्र रहा है। यहां की मिट्टी में कालगणना की परंपरा रची-बसी है, जब दुनिया समय को समझने की शुरुआत कर रही थी, तब उज्जैन के विद्वान ग्रह-नक्षत्रों की सटीक गणना कर रहे थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ग्रीनविच से पहले शून्य देशांतर रेखा का आधार उज्जैन रहा है और यह शहर प्राचीन समय मापन का वैश्विक केंद्र माना जाता था।
मुख्यमंत्री ने विज्ञान और अध्यात्म के संबंध को समझाते हुए कहा कि ब्रह्मांड की हर वस्तु समय के अधीन है, लेकिन भगवान शिव उस अनंत शक्ति के प्रतीक हैं, जहां से समय की उत्पत्ति और अंत दोनों होते हैं। इसी कारण उन्हें ‘मास्टर ऑफ टाइम’ कहा जाता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान भी समय और अंतरिक्ष को एक-दूसरे से जुड़ा मानता है, जबकि भारतीय शास्त्रों में यह सिद्धांत हजारों साल पहले स्थापित हो चुका था।
अपने संबोधन में उन्होंने उज्जैन को “साइंस सिटी” के रूप में विकसित करने की दिशा में चल रहे प्रयासों का जिक्र किया। इसी कड़ी में 15 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से बने नए साइंस सेंटर का लोकार्पण किया गया, जहां विज्ञान से जुड़ी आधुनिक सुविधाएं, इनोवेशन स्पेस और स्टूडेंट एक्टिविटी जोन तैयार किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पहल नई पीढ़ी को भारतीय वैज्ञानिक परंपरा से जोड़ने और उनमें वैज्ञानिक सोच विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इस अवसर पर सिंहस्थ-2028 की तैयारियों को लेकर भी कई बड़ी घोषणाएं की गईं। करीब 700 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले उज्जैन बायपास रोड का भूमि-पूजन किया गया, जिससे शहर में यातायात सुगम होगा और लाखों श्रद्धालुओं को सुविधा मिलेगी। इसके साथ ही ‘सम्राट विक्रमादित्य – द हेरिटेज’ परियोजना के विस्तार की भी आधारशिला रखी गई, जिससे धार्मिक पर्यटन को नया आयाम मिलेगा।
मुख्यमंत्री ने अपने ग्रीनविच दौरे का उल्लेख करते हुए कहा कि उज्जैन और डोंगला क्षेत्र की खगोलीय सटीकता अद्भुत है। डोंगला को अब एस्ट्रोनॉमिकल स्टडीज के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां 21 जून को सूर्य की छाया शून्य हो जाती है। उन्होंने कहा कि यह वैश्विक स्तर पर उज्जैन की वैज्ञानिक पहचान को फिर से स्थापित करने का उपयुक्त समय है।
कार्यक्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी उज्जैन की विशेषता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह शहर विज्ञान और आध्यात्म के संगम का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यहां की परंपराएं केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच पर आधारित हैं। उदाहरण के तौर पर महाकाल मंदिर में वैशाख मास से शुरू होने वाली जलधारा परंपरा को उन्होंने पर्यावरण और मौसम के अनुरूप विकसित एक वैज्ञानिक व्यवस्था बताया।
शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलावों पर बात करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख किया और कहा कि अब शिक्षा को रटने तक सीमित न रखकर क्रिटिकल थिंकिंग, डिजाइन और इनोवेशन की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाला समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों का है, ऐसे में भारतीय विद्यार्थियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना जरूरी है।
सम्मेलन के दौरान “महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम” विषय पर आधारित प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान से लेकर आधुनिक अंतरिक्ष तकनीक तक का प्रदर्शन किया गया। इसरो, आईआईटी इंदौर और अन्य संस्थानों के मॉडल आकर्षण का केंद्र रहे। साथ ही विद्यार्थियों के लिए सैटेलाइट मेकिंग वर्कशॉप का आयोजन किया गया, जिसमें इंजीनियरिंग के छात्रों ने नैनो सैटेलाइट बनाने की प्रक्रिया सीखी।
इस मौके पर विद्यार्थी विज्ञान मंथन की वेबसाइट, ब्रोशर और पुस्तिका का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में देशभर से आए वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और विचारकों ने भाग लिया और उज्जैन को एक बार फिर वैश्विक कालगणना केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में मंथन किया।
कुल मिलाकर यह आयोजन केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि उज्जैन की प्राचीन वैज्ञानिक पहचान को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करने का एक बड़ा प्रयास साबित हुआ, जिसमें आस्था, विज्ञान और भविष्य की संभावनाओं का अनूठा संगम देखने को मिला।