इंदौर में दूषित पेयजल से जुड़ा स्वास्थ्य संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। बुधवार को इस मामले में 30वीं मौत की पुष्टि हुई। भागीरथपुरा निवासी 62 वर्षीय लक्ष्मी रजक की उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। परिजनों के अनुसार, भर्ती के समय डॉक्टरों ने किडनी खराब होने की जानकारी भी दी थी।
इससे एक दिन पहले, इसी इलाके में रहने वाले खूबचंद की भी दूषित पानी से जुड़ी बीमारी के चलते मौत हो चुकी है। उनकी मृत्यु के बाद आक्रोशित परिजनों ने बुधवार को अंतिम संस्कार से पहले शव को सड़क पर रखकर विरोध प्रदर्शन किया। हालांकि प्रशासन का दावा है कि स्थिति अब नियंत्रण में है और फिलहाल सिर्फ 6 मरीज अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से 3 आईसीयू में हैं और एक मरीज वेंटिलेटर पर है।
हाईकोर्ट में ढाई घंटे चली सुनवाई, रिपोर्ट पर उठे सवाल
दूषित पानी से हो रही मौतों को लेकर मंगलवार, 27 फरवरी को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में सुनवाई हुई। यह सुनवाई ढाई घंटे से अधिक समय तक चली। शुरुआत में मुख्य सचिव अनुराग जैन करीब 10 मिनट तक वर्चुअल रूप से उपस्थित रहे।
इस दौरान कोर्ट के समक्ष 23 मौतों की एक रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें 16 मौतों को दूषित पानी से संबंधित माना गया, चार मामलों को लेकर असमंजस जताया गया, जबकि तीन मौतों को दूषित पानी से असंबंधित बताया गया। हालांकि कोर्ट ने इस रिपोर्ट को लेकर गंभीर असहमति जताई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा कि स्वच्छ पेयजल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। कोर्ट ने माना कि यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति का संकेत देता है।
न्यायालय ने राज्य सरकार और नगर निगम की ओर से पेश की गई रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि जमीनी स्तर पर सुरक्षित जल आपूर्ति, चिकित्सा सुविधा और जांच से जुड़े निर्देशों का प्रभावी पालन नहीं किया गया।
मौतों की संख्या पर गहरा विवाद
कोर्ट के सामने सरकारी आंकड़ों और याचिकाकर्ताओं के दावों के बीच बड़ा अंतर सामने आया। जहां सरकारी रिपोर्ट में 16 मौतों को जलजनित बीमारी से जोड़ा गया, वहीं याचिकाकर्ताओं ने मृतकों की संख्या लगभग 30 बताई। कोर्ट ने इस अंतर को गंभीर मानते हुए निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की आवश्यकता जताई।
रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय जांच आयोग के गठन का आदेश दिया। आयोग को जल प्रदूषण के कारण, वास्तविक मौतों की संख्या, बीमारियों की प्रकृति, चिकित्सा व्यवस्था की पर्याप्तता, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और पीड़ितों को मुआवजे से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कर रिपोर्ट सौंपनी होगी।
कोर्ट ने आयोग से चार सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। अगली सुनवाई 5 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है।
आयोग को सिविल कोर्ट जैसे अधिकार
जांच आयोग को सिविल कोर्ट के समान अधिकार दिए गए हैं। आयोग अधिकारियों और गवाहों को तलब कर सकेगा, दस्तावेज मंगा सकेगा, जल गुणवत्ता की जांच करवा सकेगा और प्रभावित क्षेत्रों का स्थल निरीक्षण भी कर सकेगा। राज्य सरकार को आयोग के लिए आवश्यक स्टाफ, कार्यालय और संसाधन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि भागीरथपुरा क्षेत्र के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से में जल आपूर्ति फिर से शुरू कर दी गई है, जो करीब साढ़े 9 किलोमीटर क्षेत्र में फैली है। हालांकि जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए।
कोर्ट ने रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए “वर्बल ऑटोप्सी” शब्द पर भी आपत्ति जताई और पूछा कि यह मेडिकल टर्म है या रिपोर्ट तैयार करने वालों द्वारा गढ़ा गया शब्द। अदालत ने यह भी पाया कि रिपोर्ट में मौतों के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किए गए हैं और उसमें ठोस तर्क व सहायक दस्तावेजों का अभाव है।
रिपोर्ट को बताया ‘आई-वॉश’
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को अस्पष्ट बताते हुए उसे मात्र एक ‘आई-वॉश’ करार दिया। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला ने नगर निगम को निर्देश दिए कि वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा सुझाए गए परीक्षणों पर गंभीरता से विचार किया जाए और कोर्ट की सभी आपत्तियों का स्पष्ट व ठोस जवाब प्रस्तुत किया जाए।
कोर्ट ने अंतरिम राहत के स्वरूप को लेकर भी चिंता जताई और पूछा कि बनाई गई समिति अपने सुझावों का निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित करेगी।
पानी की जांच और सप्लाई व्यवस्था पर सवाल
एडवोकेट बागडिया ने तर्क दिया कि डेथ ऑडिट रिपोर्ट में 16 मौतों को दूषित पानी से जोड़ा गया है, लेकिन रिपोर्ट के रिमार्क कॉलम में इसका स्पष्ट उल्लेख तक नहीं है। इससे स्थिति और अधिक भ्रमित होती है।
नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि जिन 16 बोरिंग से गंदा पानी आ रहा था, उन्हें बंद कर दिया गया है। इस पर याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि यदि पानी खतरनाक है, तो बोरिंग को पूरी तरह सील क्यों नहीं किया गया। निगम ने तर्क दिया कि बोरवेल बंद करने से अन्य घरेलू उपयोग प्रभावित होंगे, इसलिए पेम्फलेट और पोस्टर के जरिए लोगों को जानकारी दी जा रही है। याचिकाकर्ता ने कहा कि क्षेत्र के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, ऐसे में यह तरीका प्रभावी नहीं है।
सिर्फ 8 मानकों पर पानी की जांच
पानी की टेस्टिंग को लेकर भी कोर्ट में गंभीर सवाल उठे। निगम की ओर से कहा गया कि पानी की जांच की गई है, लेकिन याचिकाकर्ता ने बताया कि यह जांच सिर्फ 8 मानकों पर की गई, जबकि 2018 में मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 34 मानकों पर जांच कर पानी को फीकल कंटामिनेटेड पाया था।
याचिकाकर्ता ने कहा कि जब भागीरथपुरा में 28 से अधिक मौतें हो चुकी हैं, तो सिर्फ 8 पैरामीटर पर जांच करना बेहद अपर्याप्त है। निगम ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि जांच की प्रक्रिया क्या थी।
मुआवजे पर भी उठे सवाल
मुआवजे को लेकर भी कोर्ट को बताया गया कि मृतकों के परिजनों को जो 2-2 लाख रुपये दिए गए हैं, वह रेड क्रॉस सोसायटी की ओर से दिए गए हैं, न कि राज्य सरकार की ओर से। याचिकाकर्ता ने कहा कि अन्य दुर्घटनाओं में सरकार 4-4 लाख रुपये मुआवजा देती है, लेकिन दूषित पानी से जान गंवाने वालों के मामले में शासन की ओर से कोई सहायता नहीं दी गई।
एक और मौत, परिवार का आरोप
इधर, मंगलवार 27 जनवरी को भागीरथपुरा में एक और मौत हुई। कोरी समाज धर्मशाला के पीछे रहने वाले 63 वर्षीय खूबचंद पिता गन्नूदास को पिछले 15 दिनों से उल्टी-दस्त की शिकायत थी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में उन्हें दवाइयां दी गईं, लेकिन हालत बिगड़ती चली गई और मंगलवार शाम उनकी मौत हो गई।
बेटे राहुल ने बताया कि उनके पिता पूरी तरह स्वस्थ थे और खुद का काम करते थे। वे मिल मजदूर रहे हैं और पहलवान के रूप में कई कुश्ती प्रतियोगिताएं जीत चुके थे। परिवार का आरोप है कि दूषित पानी से हुई बीमारी ही उनकी मौत का कारण बनी।