सुप्रीम कोर्ट ने पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस हथियार के उपयोग पर पूरी तरह से रोक लगाना फिलहाल संभव नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान कुछ परिस्थितियां ऐसी हो सकती हैं, जहां पुलिस को सीमित और नियंत्रित तरीके से पैलेट गन का सहारा लेना पड़ सकता है। हालांकि कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि इसके इस्तेमाल के लिए तय दिशा-निर्देशों की समीक्षा आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि पैलेट गन के उपयोग को लेकर वर्तमान स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) क्या है और उसमें किन सुरक्षा उपायों को शामिल किया गया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी बल प्रयोग के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया होना बेहद जरूरी है, ताकि नागरिकों के अधिकारों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सके।
न्यायालय ने कहा कि पैलेट गन को सामान्य परिस्थितियों में इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका उपयोग केवल तब किया जाना चाहिए जब हालात नियंत्रण से बाहर हों और अन्य कम नुकसान पहुंचाने वाले उपाय पर्याप्त साबित न हो रहे हों। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस को हर कार्रवाई में न्यूनतम आवश्यक बल के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिनमें 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए घटनाक्रम के दौरान पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए गए थे। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ गया था, जिसके बाद बल प्रयोग किए जाने के आरोप लगे। याचिकाकर्ताओं ने पुलिस की कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, लेकिन यदि स्थिति हिंसक रूप ले लेती है या सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीर खतरा उत्पन्न होता है, तो प्रशासन को हस्तक्षेप करने का अधिकार और दायित्व दोनों होते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस की कार्रवाई की वैधता का आकलन तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।
अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि पैलेट गन के इस्तेमाल से पहले पुलिस किन वैकल्पिक उपायों को अपनाने के लिए बाध्य है। न्यायालय यह जानना चाहता है कि क्या चेतावनी, भीड़ नियंत्रण के गैर-घातक साधन और चरणबद्ध कार्रवाई जैसी प्रक्रियाएं अनिवार्य रूप से लागू की जाती हैं। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि पैलेट गन अंतिम विकल्प के रूप में ही इस्तेमाल हो।
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि पैलेट गन से गंभीर चोटों की आशंका बनी रहती है। इस पर कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा बलों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले किसी भी उपकरण के संबंध में मानवाधिकार और सार्वजनिक सुरक्षा दोनों पहलुओं पर समान रूप से विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि SOP की समीक्षा के दौरान इन चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि जवाबदेही और प्रशिक्षण अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि पुलिस बल को उचित प्रशिक्षण, स्पष्ट निर्देश और निगरानी तंत्र उपलब्ध कराया जाए, तो बल प्रयोग की आवश्यकता और उससे होने वाले नुकसान दोनों को कम किया जा सकता है। अदालत ने पेशेवर और नियंत्रित पुलिसिंग की आवश्यकता पर जोर दिया।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह पैलेट गन के उपयोग से संबंधित मौजूदा दिशा-निर्देश, सुरक्षा प्रोटोकॉल और समीक्षा व्यवस्था का विस्तृत ब्योरा पेश करे। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि SOP में किसी संशोधन, अतिरिक्त सुरक्षा उपाय या नई निगरानी व्यवस्था की जरूरत है या नहीं। फिलहाल अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध की मांग स्वीकार नहीं की है।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक संतुलित रुख अपनाते हुए संकेत दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पैलेट गन का इस्तेमाल अपवाद स्वरूप और सख्त नियंत्रण में ही होना चाहिए, जबकि इसके लिए प्रभावी, मानवीय और जवाबदेह SOP सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।

