उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी गांवों तक डाक पहुंचाने के लिए अब डाक विभाग ड्रोन का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए प्रदेश में संभावित ड्रोन रूट तैयार किए जा रहे हैं और इसकी शुरुआत पौड़ी जिले से किए जाने की संभावना है।
पायलट प्रोजेक्ट के तहत पहले उन इलाकों को चुना जाएगा, जहां सड़क के रास्ते डाक और पार्सल पहुंचाने में ज्यादा समय लगता है। ट्रायल सफल होने पर दूसरे पहाड़ी जिलों में भी ड्रोन के जरिए डिलीवरी शुरू की जा सकती है।
उत्तराखंड में बारिश, भूस्खलन और बर्फबारी के दौरान कई बार सड़क संपर्क बाधित हो जाता है। ऐसे में ड्रोन के जरिए दूरस्थ गांवों तक डाक पहुंचाना आसान हो सकता है और सड़क मार्ग पर निर्भरता भी कम की जा सकती है।
डाक विभाग ने ड्रोन डिलीवरी का मॉडल पहले असम और हिमाचल प्रदेश में तैयार किया है। दोनों राज्यों में करीब 150 ड्रोन रूट बनाए गए हैं। इन प्रयोगों से मिले अनुभव के आधार पर अब उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के लिए भी मॉडल तैयार किया जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश के मंडी में ड्रोन के जरिए करीब 12 किलोमीटर की दूरी 6 से 7 मिनट में तय करने का ट्रायल किया जा चुका है। इसी तरह की तकनीक को उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार इस्तेमाल करने की योजना है।
पहाड़ी क्षेत्रों में डाक पहुंचाने के लिए कर्मचारियों को कई बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। सड़क खराब होने या रास्ता बंद होने की स्थिति में डिलीवरी में और अधिक समय लग सकता है। ड्रोन के इस्तेमाल से इस परेशानी को कम करने में मदद मिल सकती है।
उत्तराखंड में मानसून और सर्दियों के दौरान कई इलाकों का सड़क संपर्क टूट जाता है। ऐसे समय में ड्रोन के जरिए जरूरी दस्तावेज और अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाने की संभावना भी देखी जा रही है।
भविष्य में जरूरत के अनुसार दवाइयों और दूसरी आवश्यक सामग्री की डिलीवरी में भी ड्रोन का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि इसके लिए अलग व्यवस्था, तकनीकी मानकों और नियमों को ध्यान में रखना होगा।
उत्तराखंड में ड्रोन डिलीवरी अभी शुरुआती चरण में है। इसलिए प्रति डाक या पार्सल डिलीवरी की निश्चित कीमत अभी तय नहीं हुई है। खर्च ड्रोन की क्षमता, रूट और संचालन व्यवस्था के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
ड्रोन की खरीद और रखरखाव, तकनीकी व्यवस्था, ऑपरेटर और अन्य संचालन खर्च भी कुल लागत में शामिल होंगे। ट्रायल पूरा होने और रूट तय होने के बाद ही इसकी वास्तविक लागत का आकलन किया जा सकेगा। अगर परीक्षण सफल रहा तो पहाड़ी क्षेत्रों में डाक पहुंचाने की व्यवस्था को तेज और सुविधाजनक बनाने में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

